अजीब दास्ताँ होती...

अजीब दास्ताँ होती है दोस्ती की,
लड़ना मिलना सा भी अच्छा  लगता है,
लड़ के मानाने वाला भी होता है कुछ,
तो कुछ को चिढाना अच्छा लगता है,
दोस्त का मुह से सुनने का लिया,
कभी झुक जाना भी अच्छा लगता है,
सफ़र ट्रेन का हो या जिंदिगी का,
ख़त्म ही नहीं होती बांते,
अच्छा लगता है,
दोस्ती में लगता है मिल गयी पूरी दुनिया,
बाकी सब भूल जाना अच्छा लगता है...

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